प्रस्तावित पर्यावरण आंकलन (संशोधन) अधिसूचना (EIA, 2020) को ख़ारिज करो ! 

सरल व्यापारके नाम पर पर्यावरण मंत्रालय का यह प्रस्ताव पर्यावरणीय नियमों को कमज़ोर करने का न्योता, लोगों के साथ धोखा !

भारत की जनता एक महामारी और उसके चलते लगी तालाबंदी से झूझ रही है और इस संकट के बीचों-बीच भारत सरकार का पर्यावरण मंत्रालय देश के पर्यावरण से जुड़े नियमों को कमज़ोर कर कंपनियों को इनसे निजाद देने की फिराक में है. मंत्रालय ने 12 मार्च को पर्यावरण आंकलन अधिसूचना, 2006 का एक संशोधित खाका अपनी वेबसाईट पर डाला था और इस पर जनता के सुझाव 60 दिनों के अन्दर आमंत्रित किये थे. परन्तु इस बीच पूरे देश में लॉकडाउन घोषित होने के बावजूद भी मंत्रालय ने इस खाके को वापिस नहीं लिया और इस पर जनता और संगठनों के सुझाव देने की आखरी तारीख, 15 मई अब सर पर है. इन परिस्थितियों में यह तकरीबन असंभव है कि इस देश के पर्यावरण को ले कर चिंतित नागरिक, संगठन और ऐसे लाखों समुदाय जो कि इस नये बदलाव से प्रभावित होंगे, वह अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव मंत्रालय को भेजें. न केवल मंत्रालय ने अधिसूचना के संशोधन की प्रक्रिया में जल्दबाजी दिखाई है बल्कि यदि इस प्रस्ताव को गौर से पढ़ा जाए तो यह मालूम होता है कि यह प्रकृति और इस पर आधारित लोगों, दोनों के लिए ही एक खतरे की घंटी है.

पर्यावरण आंकलन अधिसूचना को (जिसको ई.आई.ए  नोटिफिकेशन भी कहते हैं) सबसे पहले 1994 में, पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम, 1986 के अंतर्गत जारी किया गया था. इसका मुख्य उद्देश्य था कि सभी विकास परियोजनाओं के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का न केवल सही-सही आंकलन हो बल्कि इस आंकलन की प्रक्रिया में प्रभावित समुदायों का मत भी लिया जाए और उसी के आधार पर परियोजनाओं को पर्यावरण मंज़ूरी मिले. इस अधिसूचना के अंतर्गत ही प्रभावित क्षेत्रों में पर्यावरण जन सुनवाई का महत्वपूर्ण प्रावधान रखा गया. वास्ताव में तो इन प्रावधानों की कई बार धज्जियां उडाई गयीं परन्तु इनके चलते किसी भी परियोजना को मंज़ूरी देने से पहले उसके प्रभावों को पैनी नज़र से आंकाने और जांचने के रास्ते भी खुले और निर्णय प्रक्रिया में जनता की भूमिका भी बढ़ी.

यह कानून भारत के पर्यावर्ण नियंत्रण प्रणाली का एक प्रमुख हिस्सा रहा और सरकारों ने इसे बार-बार संशोधित कर कंपनियों के फायदे के लिए इसको ढीला किया. और अब ई.आई.ए 2020 की अधिसूचना में मंत्रालय ने कई ऐसे ज़बरदस्त बदलाव प्रस्तावित करते हुए इस अधिसूचना के उद्देश्य पर सीधा ही वार किया है.

मुख्य प्रस्तावित बदलावों में शामिल है:

१. मंज़ूरी के पहले परियोजना निर्माण कार्य करनी की छूट !

२. कई परियोजनाओं को पर्यावरण जन सुनवाई से मुक्ति !

३. खदान परियोजनाओं की मंज़ूरी की वैलीडीटी अवधि में बढ़ोतरी !

४. मंजूरी के बाद नियंत्रण और निगरानी के नियमों में भारी ढील !

मंत्रालय ने साफ़-साफ़ यह कह दिया है कि व्यवसायों को और कंपनियों के लिए व्यापार सुगम करना इस प्रस्ताव का उद्देश्य है. यह जबकि देश के पर्यावरण की हालत पहले ही खस्ता है – वायु, जल और मिटटी के प्रदूषण से शहर और गाँव त्रस्त हैं और प्राकृतिक संपदा निरंतर नष्ट हो रही है. पर्यावरणीय और जलवायु संकट के चलते आपदाएं बढ़ रही हैं और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर समुदाय अपनी आजीविका और जीन के स्रोत खोते जा रहे हैं. इनमें देश के किसान, मछवारे, वन आधारित आदिवासी, पशु-पालक, दलित और कई समुदाय शामिल हैं जो विस्थापन और प्रदूषण की मार झेल रहे हैं. ऐसे में मंत्रालय को पर्यावरण को सुरक्षित करने और प्राकृतिक संतुलन बनाये रखने के लिए जनता की भागीदारी को मज़बूत करते हुए रणनीतियाँ और नियम लागू करने चाहिए थे ना कि पूंजीपतियों को मुनाफे कमाने के लिए देश के संसाधनों को कौड़ियों के दाम बेचना.

जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (NAPM) इस अधिसूचना के प्रस्ताव का विरोध करते हुए यह मांग करता हैं कि इस अधिसूचना को अतिशीग्र ही वापिस लिया जाये. सबसे पहले तो कानून में बदलाव प्रस्तावित करने का यह समय ही गलत है – क्यों कि अधिकतर लोग इस पर अपने सुझाव देने के लिए असमर्थ हैं. यदि सरकार को प्रस्ताव देना ही है तो इस लॉकडाउन के खुलने के पश्चात, पूरी समय अवधि देते हुए और एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया से लोगों के सुझाव लेते हुए और उसके बाद ही कोई प्रस्ताव सामने रखा जाए. हम मांग करते हैं कि देश के पर्यावरण नियम कानूनों को और मज़बूत किया जाए जिसमें लोगों कि भूमिका को निर्णय प्रक्रिया में सबसे अधिक महत्व दिया जाये ताकि पर्यावरण संरक्षण कर हम अपनी आने वालो पीढ़ीयों का भविष्य सुरक्षित कर सकें |

आप सभी से अपील है कि 15 मई से पहले पहले इस लिंक पर जा कर इस प्रस्ताव को वापिस लेने की मांग का समर्थन करें. https://letindiabreathe.in/WithdrawDraftEIA2020

इसके अलावा आप स्वयं अपने स्तर पर इसका विरोध करते हुए अपना ज्ञापन पर्यावरण मंत्रालय को mefcc@gov.in पर भेज सकते हैं.

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें: फोन: 7337478993, 9869984803

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